एक व्यंग्य : सखेद सधन्यवाद ,....
इधर विगत कुछ दिनो से जब मेरी रचनाएं ’सखेद सधन्यवाद’ वापस आने लगी तो मुझे हिंदी की ’दशा’ व ’दिशा’ दोनों की चिन्ता होने लगी।अब यह देश नहीं चलेगा। रोक देंगे हिंदी के विकास रथ को ये संपादकगण। ले डूबेंगे हिंदी को ये सब।जितने उत्साह व तत्परता से मैं अपनी रचना...
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आनन्द पाठक
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[25 Jul 2009 01:45 AM]



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