एक व्यंग्य: समर्पित है ....
एक व्यंग्य : समर्पित है....पाण्डुलिपि तैयार हो गई। काफी श्रम से लिखा था।दिन को दिन नहीं ,रात को रात नहीं समझा।छ्पास की जल्दी थी।हिंदी का लेखक लिखने में जल्दी नहीं करता ,छपने की जल्दी में रहता है। परन्तु जिस का भय था ,वही हुआ।समर्पण का।संग्रह समर्पित नहीं...
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आनन्द पाठक
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[07 Aug 2009 03:38 AM]



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