---- शायद तुम आ जाओ #
उस दिन तय था किहम मिलेंगेइसी दरख्त के नीचेपरिन्दों की चहकन सुनते हुएबैठा रहा मैं ख्वाब बुनते हुएसमय के भान से परे हो गया थाऔर ---------- और तुम नहीं आई.आज जबकि तय है कितुम नहीं मिलोगीइस दरख्त के नीचेतनहा आँखें मीचेपरिन्दों की चहकन सुनते हुएबैठा रहा हूँ...
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M VERMA
कविता
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[03 Aug 2009 08:21 AM]



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