गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ३)
शाम हो चली थी। दिन भर अपनी गर्मी से धरा को तपाता सूरज थक चुका था। रोशन को स्टेडियम जाना था। गुस्ताव कहीं भी चल सकता था सिवाय घर वापिस लौटने के। पुस्तकें अपने थैले में डालकर गुस्ताव अपनी साइकिल पर रोशन के स्कूटर से मुकाबला करने की कोशिश भर करता बढ़...
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Rahul Singh
creative writing - stories
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[15 Sep 2009 16:27 PM]



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