कवायद
अब तो हर नज्म तेरी खातिर लिखता हूँ,अशआरों के चंद टुकड़े भी जोड़ता हूँ,अक्सर जबां तो चुप ही रहती है,जब प्यार कलम औ पन्ने का देखता हूँ । जब भी देखता हूँ तुम्हारी खामोश नजरें,मेरी पलकों को झुकना पड़ता है , होठ सकुचाते हैं मुस्कुराने में ,मस्तक ख़ुद -ब-ख़ुद ही...
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Navnit Nirav
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[19 Aug 2009 14:48 PM]



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