अपना हीं घर वह तो नहीं
गमगीन है हर आदमी क्यों खो गया सुख चैन । क्यों रोकता कोई नहीं इस जंग को तूफान को । क्यों बह रहा है नालियों में खून मेरे अपनो का । शाख पर जो स्वप्न थे क्यों झड़ गया वह पर्ण है । क्यों हो रहा नंगा यहाँ सब कैसी मची हुरदंग है । जो चले थे हम जलाने...
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चंदन कुमार झा
शहर
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[16 Sep 2009 08:51 AM]



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