बस यूं ही बैठे-बैठे...
रविवार की सुबह वही रोज की तरह देरी से उठा करीब 11 बजे। जब से पत्रकारिता के पेशे में कदम रखा है तब से देर तक जागना और देर सबेरे उठने की गंदी आदत विकसित हो गई। आंख मिचते ही कुर्सी की ओर देखा अखबार रखे हैं या नहीं। घर में सबको पता है तो जो भी पढऩे के लिए...
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lokendra singh rajput
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[29 Dec 2009 05:43 AM]



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