देश की जनता आर्थिक गुलाम बन कर रह गई है
इंसान की जि़न्दगी बिल्ली बन चुकी है और इंसान स्वयं चूहा बनकर रह गया है इंसान अपनी जि़न्दगी बचाने के लिए चूहे की तरह दौड़ रहा है। उसकी आज़ादी, उसकी मौलिकता इस तेज़ी से दौड़ती जि़न्दगी रूपी बिल्ली से बचाने में समाप्त हो रही है। हम आज़ादी के...
[पूरी पोस्ट]
हरिओम त्यागी
9
0
0
0
0
[31 Dec 2009 03:24 AM]



Shuffle








