मैंने वो सपना सहेज रखा है...

अभिव्यक्ति उनींदी स्याह रातों में...रिश्तों की उलझी डोर से,जिसे तुमने बुना था,वो सपना...मैंने सहेज रखा है...हाँ वही सपना...!!जो तुम्हें जान से प्यारा था..वही सपना...जो तुम्हारे मन का सहारा था...पलकों की चादर फैंक,आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...जब रोकता हूँ इसकोतो... [पूरी पोस्ट]
writer gargi gupta

कविता

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[01 Sep 2009 02:43 AM]

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