सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए.....

अभिव्यक्ति कभी मैं चल नहीं पाया, कभी वो रुक नहीं पाए।मेरे जो हमसफ़र थे, साथ वो रह नहीं पाए।।मेरे घर में नहीं आई, कितने सालों से दीवाली।तू आ जाये तो आँगन में, अँधेरा रह नहीं पाए।।लगाते हैं सभी तोहमत, मैं तुझसे हार जाता हूँ।मेरी हस्ती ही ऐसी है, कि कोई टिक नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer gargi gupta

दीपक "मशाल"

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[01 Sep 2009 02:42 AM]

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