कुछ दिलजलों को

अभिव्यक्ति उतरने लगा है नाकाम मोहब्बत का नशा जिन्दगी जीने की जद-ओ-जहद फिर आडे आ रही यादों का बोझ उठाने में बड़ा हूँ तो बोझ भी उठाना है घर का तो तुम्हे याद करने का एक नायब तरीका ढूंड निकाला है जिस से रोजी भी चलती रहती है बस यूँ करता हूँ की रोज कमाई की खातिर तुम्हारी... [पूरी पोस्ट]
writer gargi gupta

कविता

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[03 Sep 2009 05:03 AM]

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