मन किया
आज न जाने क्यूँ रोने को मन किया।माँ के आंचल में सर छुपा के सोने को मन किया।दुनिया की इस भाग दौड़ में,खो चुका था रिश्तेय सब।आज फिर उन रिश्तो को इक सिरे से संजोने का मन किया।दिल तोद्ता हूँ सब का अपनी बातों से,लड़ने का मन भी तो आपनो के मन से किया।ता उमर...
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gargi gupta
कविता
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[08 Sep 2009 01:14 AM]



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