हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,

अभिव्यक्ति जो छूट गई है दुनिया में,, मेरी ही कुछ हस्ती थीसाहिल छोर के दरिया डूबी , मजबूत बड़ी वो कश्ती थीउनका घर तो रौशन था पर डर था सबके चेहरे परएक उनके घर में रौनक थी और जलती सारी बस्ती थीकुछ जिन्दा और मुर्दा लड़ते अल्लाह ईश के नाम पर खामोशी मजबूरी थी कुछ जान यहाँ... [पूरी पोस्ट]
writer gargi gupta

कविता

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[23 Sep 2009 03:57 AM]

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