मन चंचल गगन पखेरू है,
मन चंचल गगन पखेरू है,मैं किससे बाँधता किसको.मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,की किससे चाह है मुझको.वो बस हालात ऐसे थे, कि बुरा मैं बन नहीं पाया.मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,कोई समझाए तो इसको.ज़माने की हवा है ये, ये रूहानी नहीं साया.मगर ताबीज़ ला दो तुम,तसल्ली गर...
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gargi gupta
कविता
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[24 Sep 2009 09:12 AM]



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