स्मृति
दिन बीत गए जाने कितने जाने कित पल छिन बीत गएअब दरस को तरसे मेरे नैन, सुनना चाहे मन बोल नएस्मृति पट पर अंकित छवि है तेरी, विरह की पीर चुराती हैपर अनायास, यूँ ही अक्सर कुछ प्रश्न नए दे जाती है .....क्या अब भी बाल की नटखट लट घुन्घ रा कर माथा छूती है?भौहें...
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Paridhi Jha
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[09 Aug 2009 12:41 PM]



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