श्रीमती तारा प्रकाश की दो कविताएं
खुद को तपाइएउनके चेहरे की झुर्रियों के न जाइएउनकी तरह से आप भी खुद को तपाइए।आसान है बोना बहुत ये नफरतों के बीजइंसान हैं गर आप तो मुहब्बत उगाइए।हैवानियत के दौर से,घबरा गए हैं लोगअब दौर नया लाइए,।इंसा बनाइए।मौत की सौगात तो दरिदें ही लाएंगेगर हो सके तो...
[पूरी पोस्ट]
अशोक मधुप
12
0
0
0
0
[23 Sep 2009 13:41 PM]



Shuffle








