ज़िन्दगी ऊन का गोला
ज़िन्दगी… ऊन के गोले की तरह खुलती जाती है आख़िर में रुकती है सिफ़र पर यादें… रात भर लहरों की तरह बहती जाती हैं थमती नहीं हैं सहर पर जज़्बात… पलछिन सागर की तरह उफ़नते रहते हैं ठिठकते हैं तो तेरी नज़र पर वजूद… मुश्किल पहेली की तरह उलझता जाता है हैरान हूँ बेबूझ...
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Pratik Pandey
कविता
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[02 Aug 2009 14:02 PM]



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