भग्न हृदय की आशा
प्रात पल्लवित हुआ पुष्प सांझ में मुरझा गया दिन को कर प्रकाशित सूर्य निशार्वट में समा गया भग्न हृदय की अश्रुधार कपोल पर शुष्क हो गयी थी जो रसासिक्त कल्पना आज वो रुक्ष हो गयी फिर भी इस दुःख-राशि में आशी को ढूंढता हूँ फिर शून्य से निर्माण को मैं अस्तित्व को...
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Pratik Pandey
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[26 Aug 2009 06:46 AM]



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