एक निर्वस्त्र दर्द
एक जागती रात के सिरहाने बैठकर,आकाश की काली आँखों में झांककर,मैंने अपना एक निर्वस्त्र दर्द उठायाझूठे सपनो के तार-तार से कपड़े पहनायेजो बचा, उसे दुनियादारी के -फटेहाल पैबन्दों से छिपायान चेहरा देखा, न रूह नापीसिर्फ़ एक एहसास पर किएक दिन मेरे दायरों से निकल...
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Sudhir (सुधीर)
दर्द
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[25 Aug 2009 01:00 AM]



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