...और किस मुकाम पर रूकती जिंदगी मेरी
(गुमनामी के सिवा) और किस मुकाम पर रूकती जिंदगी मेरी तपती दुपहरी की धुप में साथ निभाने को अपने साये नहीं होते। भरी भीड़ की भगदड़ में गिरनेवालों को उठानेवाले भी नहीं होते । सबका गम बाँटता आया हूँ उम्र-भर , तो फिर आज शिकवा क्यों यह गम ही तो हैं जिंदगी भर की...
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Sudhir (सुधीर)
चिंतन
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[01 Sep 2009 15:02 PM]



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