"कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं..."
कुछ घटनाओं को जब मैंने कल्पना के चादर में लपेटा तो यही पंक्तियाँ बन पड़ी। जिसमे मैंने हास्य का तड़का देने का भरपूर प्रयास किया है। ये मेरा हास्य का प्रथम प्रयास अब आपके सामने प्रस्तुत है......... आज भी हम ठण्डी आहें भरा करतें हैंकागज के जहाज अक्सर उछाला...
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लोकेन्द्र
'हास्य...'
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[02 Oct 2009 10:08 AM]



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