हा फिर भी ऐसा ही हो..........

तेरे नाम........यही तो है। *~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*फूल को छुने की खातिर कांटो से जख्मी होते हैजो झोली में आ गिरते थे उन्हें छुने से डर जाते हैजब बारिश बरसा करती थी...हम छतरी में छुप जाते थेऔर जलती धुप में नंगे पांव हम छत पर उछला करते थेजब पास वो होता था तो हम देख उस उसको ना... [पूरी पोस्ट]
writer गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी

तेरे नाम

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[25 Jul 2009 08:10 AM]

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