तु जो नहीं..........कुछ भी नहीं
*~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*अगर गुफ्तगु का आगाज में करताझिझकती, बिगड़ती मगर मान जातीजो मैं बढ़ कर उसके कदम रोक लेतावो पांव पटकती मगर मान जातीअगर चंद कलियाँ उसे पैश करतावो दामन झटकती मगर मान जातीमैं कहता ‘चलों तुम को घुमा कर लाता हुँ’अकड़ती, झिझकती मगर...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
वो तेरा नाम था.....
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[27 Jul 2009 10:49 AM]



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