ग़ज़ल : ज़िन्दगी की साँझ ज्यों ज्यों ढल रही है
ज़िन्दगी की साँझ ज्यों ज्यों ढल रही है,एक बस तेरी कमी ही खल रही है ।ख़ून परवाने का उसके मुँह लगा है,शाम होते ही शमा फिर जल रही है ।हौसला तो देखिए इस नाव का भी,मूंग छाती पर नदी की दल रही है ।चाल अपनी, ज़िन्दगी तो चल चुकी है,मौत अब तो चाल अपनी चल रही है ।चार...
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शरद तैलंग
ग़ज़ल
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[13 Sep 2009 03:49 AM]



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