समेटे हूँ मैं टुकड़ों को
सबब थी जीने का जो भीहर उस ख्वाहिश ने दम तोडाखामोशी इस कदर छाईकी सब ख्वाबों ने घर छोड़ा । दर-ओ-दीवार जिस घर कीमुझे जाँ से भी प्यारी थीफ़क़त इस पेट की खातिरमैंने उस घर को भी छोड़ा । तलाश-ए-जीस्त में हमनेखाक छानी है सहरा कीमसर्रत छिन गई तब सेवतन जब से मैंने...
[पूरी पोस्ट]
निर्झर'नीर
9
0
0
0
0
[11 Sep 2009 04:57 AM]



Shuffle








