बस यूं ही...
कई दिनों से कुछ नहीं लिखा, तो बस यूं ही...उस घर लगी थी आग, और मैं यहां डरा था।तेरा दिया था जख्म, वो जख्म भी हरा था।छिप गया मैं जाकर, पीपल की आड़ में,अब भी वहीं खड़ा हूं, तब भी वहीं खड़ा था।।मद्धम है आंच उसकी, ठंडी है बिजलियां।शायद संभल भी जाए, वो पगली...
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sandeep sharma
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[11 Sep 2009 12:12 PM]



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