स्वप्न और देश
पोस्ट नंबर 17स्वप्न अधूरे रह जाने से, कोई देश नहीं मरता है। सपनीली नव कलिका से ही ठूंठ हरा हो कर भरता है। जीवन के कोटर में विषधर, फण को ओट किए बैठे हैं। सजग चुनौती की मुद्रा में पारधि प्रत्यंचा ऐठें हैं। मेरी मौत भले हो जाए, जन विश्वास नहीं मरता है।...
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MAVARK
कविता
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[12 Aug 2009 10:24 AM]



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