खुशबू बारिश की नहीं, मिट्टी की है ...
धुंए से भरी शाम अधखुले रोशनदानों से जो भीतर आने लगती तो दबे पाँव उदासी घर में इस तरह पसर जाती जैसे ये उसी का घर हो. दरवाजे से देखो तो दूर सामने राजपरिवार का विशाल महल दिखाई पड़ता जबकि पीछे की खिड़की कुछ इस तरह का दृश्य उत्पन्न करती जैसे विराट निर्जन...
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Kishore Choudhary
दिल-ए-नाकाम
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[24 Dec 2009 03:12 AM]



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