रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

मीत  रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है... प्रेम की अलमारी में, कब से इसे बंद किया था,हर नाते की चाप को, मुस्कुरा के सह लिया था,संबंधों की गठरी से, टुकडा-टुकडा कर गिर पड़ा है,रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...तकिया से मन को, कभी सराहने पे... [पूरी पोस्ट]
writer मीत
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[16 Sep 2009 02:04 AM]

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