आज रात कुछ थमी-थमी सी
आज रात कुछ थमी-थमी सीस्वप्न न जानें कैसे भटकेनयनों की कोरो से छलकेदूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सीदर्दो का वह उडनखटोलाले कर मेरे मन को डोलास्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सीशंकाओ का कसता धेराकैसा होगा मेरा सवेरामंजिल के सिरहाने पर...
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vikram7
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[09 Aug 2009 07:27 AM]



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