vikram7
पंक्षी आता हैंशिला खंड में बैठअपने परों को फडफडाता हैंसूरजसमेटने लगता हैंअपनी स्वर्णिम छविजा छुपता हैंपश्चिम के आँचल मेंनिशा गहरा जाती हैंपंक्षी सो जाता हैंपरों को समेट अपने घोसले मेंछा जाता हैं सन्नाटाहाँ नहीं रुकताझरने का बहनापवन का चलनापंक्षी निकालता...
[पूरी पोस्ट]
vikram7
8
0
0
0
0
[12 Aug 2009 03:50 AM]



Shuffle








