मैं जीवन का बोधि-सत्व क्याँ खो बैठा हूँ.....
मैं जीवन का बोधि-सत्व क्याँ खो बैठा हूँया जीवन के सार-तत्व में आ बैठा हूँमैं अनंत की नीहारिका में अब क्या ढूढूँस्वंम पल्लवित सम्बोधन में खो बैठा हूँराग और अनुराग लिये मैं जी लेता हूँजीवन का यह जहर निरंतर पी लेता हूँसत्यहीन क्या सृजन कभी भी संभव...
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vikram7
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[20 Aug 2009 14:53 PM]



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