होती है जब भी शाम सखे....
होती है जब भी शाम सखेतरु पातों को करके कंचनसरिता को दे सिन्दूरी तनजाने से पहले करता है,रवि धरती का ऋँगार सखेहोती है जब भी शाम सखेनीडो मे सबको पहुचातारवि अस्ताचल को हैं जातापश्चिम की गोदी मे छुप कर वह करता हैं ,विश्राँम सखेहोती है जब भी शाम सखेमेरी आशा की...
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vikram7
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[29 Aug 2009 04:30 AM]



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