ओ मधुमास मेरे ..........
ओ मधुमास मेरे जीवन केक्यूँ इतने सकुचे सकुचे होशिशिर गया फिर भी सहमे होकहा बसंती हवा रह गयी.क्या दिन आये नहीं फाग केजीवन की इन कलिकाओं मेंमेरे मन की आशाओं मेकब पराग भर पावोगे तुम ,शिशिर-समीरण से बच करकेअधर मेरे अतृप्त बडे हैंखाली सब मधुकोष पड़े हैंकौन ले...
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vikram7
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[11 Sep 2009 12:51 PM]



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