बाट जोहते हुये

कवितायन जबसे,परिवार छोटे और मॉड्यूलर हुये हैंछाते भी सिमटने लगे हैं आकार मेंछाता,अब कम ही देखने में आता है काला, सारस सा गर्दन मोड़े हुये बड़ा इतना की घुटनों के नीचे तक कपड़े भीगने से बचें रहेवैसे भी अब इतने बड़े कपड़े पहनता कौन हैयह छाते,पुरखों से हस्तांरित होते... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[25 Jul 2009 02:23 AM]

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