अपनी सीमाओं से परे
मुझे,सुबह कोई,साजिश रचती हुई लगती हैछोटी होती परछाईयों का खौफ़ दिल बैठाता हैयूँ लगता है किमेरे सपनों से दुश्मनी पाले बैठा है कोईदुनिया भागते हुये लगती हैऔर मैं जकड़ा जाता हूँअपने ही साये मेंमुझे,दिन में ड़र लगता हैघर से बाहर निकलने मेंसिहरन महसूस होती...
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मुकेश कुमार तिवारी
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[08 Aug 2009 01:10 AM]



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