गज़ल : वो जब भी मुझे देखता है

कवितायन जरूर कुछ ना कुछ तो कहीं जलता है आँखें मसलता है वो जब भी मुझे देखता है दर-ओ-दीवार पीते हैं कोहराम रात-दिन इक समंदर मेरे घर से होकर गुजरता है फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे ना जाने कौन... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[03 Sep 2009 09:38 AM]

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