....बने रहने के लिये
अपने आस-पास बनी हुई या चलती हुई व्यवस्था में, मैं कबि जब अपने को खोजता हूँ तो निरर्थक सा महसूस करता हुँ या समय से पीछे चलता हुआ एक ऐसी मौजूदगी जो गैरजरूरी रूप से मौजूद है और वही घुटन जब शब्दों के साँचे में ढलती है तो ........मैं,उस व्यवस्था में उतना ही...
[पूरी पोस्ट]
मुकेश कुमार तिवारी
3
0
0
0
0
[12 Sep 2009 07:28 AM]



Shuffle








