गज़ल : जज्बात भरी कहानी छोड़
कुछ अपनी शैतानी छोड़ कुछ अपनी हैवानी छोड़आपाधापी बहुत हो चुकी कोई शाम सुहानी छोड़चिंता किसकी मिटी जहाँ में इक उजली पेशानी छोड़ कौन बदल पाया है नसीबा जिद अपनी बेमानी छोड़ रेत समय की क्या लिक्खूंहसरत भरी जवानी छोड़एक दिन तुझको भी जाना हैअपनी कोई निशानी छोड़ बेदिल...
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मुकेश कुमार तिवारी
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[21 Sep 2009 01:40 AM]



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