अभीष्ट
तुम्हारे घन-केश कीशीतल छाँव को हीमान लिया थामैंने अपना अभीष्ट,जब तकनहीं भींगा थातुम्हारे हृदयाकाश से झरतेशीतल फुहारों में ।तुम्हारीसीप सी सुन्दर,झील जैसी गहरीपनीली आँखों में हीडूब जाने का स्वप्न देखा था,जब तकअनजान थातुम्हारे अंतह में उमड़तेअनंतअथाहस्नेह...
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प्रताप नारायण सिंह
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[03 Aug 2009 04:23 AM]



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