दोहे -प्रेम और श्रृंगार के
अन्दर मेरे तुम प्रिये , बाहर तुम ही होयजित देखूँ तित तू दिखे , और न दूजा कोयमैं तो, अब मैं ना रहा, तुम-मय भीतर वाह्यतेरा ही मन प्रान प्रिये , जब से कन्ठ लगायअंध कूप में था पड़ा, लिये सघन अँधियारअमिट उजाला छा गया, झाँके वे इक बारतम ही तम फैला रहा, अवनि और...
[पूरी पोस्ट]
प्रताप नारायण सिंह
13
0
0
0
0
[06 Aug 2009 04:28 AM]



Shuffle








