दोहे -प्रेम और श्रृंगार के

अनुभूतियाँ अन्दर मेरे तुम प्रिये , बाहर तुम ही होयजित देखूँ तित तू दिखे , और न दूजा कोयमैं तो, अब मैं ना रहा, तुम-मय भीतर वाह्यतेरा ही मन प्रान प्रिये , जब से कन्ठ लगायअंध कूप में था पड़ा, लिये सघन अँधियारअमिट उजाला छा गया, झाँके वे इक बारतम ही तम फैला रहा, अवनि और... [पूरी पोस्ट]
writer प्रताप नारायण सिंह
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[06 Aug 2009 04:28 AM]

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