उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है
गम नहीं कि राह में मेरी, गुलों का घर नहीं है ।बस्तियाँ काँटों की हैं, पर हाथ में नश्तर नहीं है ।है अजब ही खेल ऐ मौला ! तुम्हारा इस जहां में,डूबता कोई, किसी को बूँद तक मयसर नहीं है ।उन सवालों को भला क्यों, फिर से तुम दुहरा रही हो,ज़िंदगी ! जिनका हमारे पास...
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प्रताप नारायण सिंह
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[26 Aug 2009 04:39 AM]



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