अभिसार

अनुभूतियाँ वह पूनम की रजनी थीकुछ उजली सी, कुछ नम सीतुम चन्दा सी उतरी थीफिर बरसी थी सावन सीवह दिवस आज भी पलताहै हर पल उर में मेरेजब मयूख बन छिन्न किएजीवन के सघन अँधेरेअब हर पल सिंचित करतींउपवन को मृदुल फुहारेंसावन रहता नभ मेरेझरतीं हैं रस की धारेंअब चाँद उतरकर नभ... [पूरी पोस्ट]
writer प्रताप नारायण सिंह
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[09 Sep 2009 03:04 AM]

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