आगे कहानी और है
यह नहीं, मैंने लिखी जो, वह कहानी "और है"स्याह पर्दे में बिलखती यह जवानी "और है" मत उतारो काठ की नावें नदी में साथियों !उठ रहे शोले धधकते, आज पानी "और है" नींद में चलते हुए ठोकर लगी, जाना तभीख्वाब तो कुछ और थे पर जिंदगानी "और है" लग रहा, ये आ रहीं छूकर...
[पूरी पोस्ट]
प्रताप नारायण सिंह
5
0
0
0
0
[09 Sep 2009 02:35 AM]



Shuffle








