जुगनुओं के ताप से कोई फसल पकती नहीं
आह हाथों की लकीरों को बदल सकती नहींजुगनुओं के ताप से कोई फसल पकती नहीं यूँ कभी कुछ देर मन बहला भले देती है यहनाव कागज़ की नदी तो पार कर सकती नहीं कालिखें कितनी पुतेंगी और अब इतिहास परबह रही खूँ की नदी जो, क्यों कभी रुकती नहींजबसे ख़ुद की है दिखी तस्वीर...
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प्रताप नारायण सिंह
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[14 Sep 2009 04:37 AM]



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