सत्य ! तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।
सत्य !तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।चेतनता के प्रथम पग पर हीमुझे ओढ़ा दिए गएआवरणों के रंध्रों में छुपेतृष्णा के असंख्य नन्हे विषधरोंके निरंतर तीक्ष्ण होते गए विषदंतों सेक्षत विक्षत,अचेतना के भँवर में डूबते उतराते,तुम्हारे गात कोअपनी आँखों में भरना चाहता...
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प्रताप नारायण सिंह
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[18 Sep 2009 07:50 AM]



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