नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए

अनुभूतियाँ नम हैं आँखें औ' हमारे दिल जले हुएचल रहे हम फिर भी लेकिन लब सिले हुए आईने को देख रोया जार जार मैंमुद्दतें थीं हो चुकीं ख़ुद से मिले हुए आस उड़ने की लिए, बस मैं खड़ा रहाआसमाँ तो था खुला, "पर" थे सिले हुए कबसे आई है नहीं तेरी हँसी यहाँएक अर्सा हो गया अब गुल... [पूरी पोस्ट]
writer प्रताप नारायण सिंह
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[25 Sep 2009 00:22 AM]

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