ज़िन्दगी फिर से

feminist poems चारों ओर फैली है धुँध सी फ़ीका चाँद, चाँदनी धुँधलीज़िन्दगी के रंग धुल गये सारेदुःखों की बदली में छुप गये तारे,टूटे-फूटे अरमानों की राख बटोरकरउम्मीदों की चिंगारी को ढूँढ़करहौसलों की आग जला ली जाये,आओ!ज़िंदगी फिर से जी ली जाये.... [पूरी पोस्ट]
writer mukti

ज़िंदगी

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[18 Aug 2009 13:43 PM]

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