फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है....

उनींदरा दिन, किसी खूंटी पर टंगी क़मीज़ नहीं थे....तो भी उन्‍हें झटक कर पहनना सीख लिया मैंने।  हर सुबह घर से निकलते हुए साफ़ और बेदाग़ दिखता हूं,  जैसे देर रात इस्‍तरी से हर शिकन को मिटा दिया गया था......अब आदत हो गई है इसकी। कोसी आवाज़ में कोई पूछता... [पूरी पोस्ट]
writer शायदा

safedi

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[24 Aug 2009 08:37 AM]

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