कभी मौत पर गुनगुना कर चले...
ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिमरस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी हैमुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के इस शेर को ईद के पावन मौके पर सुनाने से रोक नहीं पाता खुद को- विशेष कर अपनी चंद महिला-मित्रों को। फिलहाल चलिये एक ग़ज़ल सुनाता...
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गौतम राजरिशी
ग़ज़ल
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[07 Oct 2009 07:07 AM]



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